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खुरचन

Posted On: 15 Aug, 2014 Others में

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गुरु लघु और लघु गुरु, आपस में है मेल
चूक हुई तों समझिये, बिगड़े सारा खेल

खीरे सा मत होइये , गर्दन काटी जाय
दुनिया से तुम तो गये, स्वाद न उनको आय

इन्द्र देव नाखुश हुए, धरती सूखी जाय
फसल बाजरा तिल करें , दूजा न अब उपाय

जग में संगत बडन की, करो सोच सौ बार
जोड़ी सम होती भली , खाओ कभी न मार

चौबे जी दूबे बने, पीटत अपना माथ
छब्बे बनने थे चले, कुछ नहि आया हाथ

मोबाइल ले हाथ में , बाला करती चैट
गिटपिट गिटपिट बोलतीं , बिल्ली पकडती रैट

आपके अनुमोदन ने , डाली मुझमे जान
सीख रहा हूँ मैं अभी, मोहे नहि अभिमान

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा
१२-०८-२०१४

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

smtpushpapandey के द्वारा
October 15, 2014

आदरणीय कुशवाहा जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने mere blog ko padha aur samarthan diya धन्यवाद shrimati पुष्प पाण्डेय

Ravinder kumar के द्वारा
August 15, 2014

प्रदीप जी, अति सुन्दर. स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं. प्रदीप जी खुरचन तो बेशक हो पर स्वादिष्ट है. इन गुदगुदाने और शिक्षा देने वाले दोहों के लिए आपको बधाई. “अक्षर” पर आपकी प्रतीक्षा रहेगी.


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