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दोहे // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //

Posted On: 1 Aug, 2014 Others में

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दोहे // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //
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बाला फिर शिकार हुई लूटी उसकी लाज
अपंगता बैरन भई सोया पड़ा समाज
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अंशदायी मात है पिता नही सौगात
काट तन जो पोस रही पुरुष लगावत घात
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नारी निंदा मत करो नारी रस की खान
जन्मदात्री रही सदा राखो इसका मान
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नारी पुरुष समान हैं भेद न करियो कोय
मिलकर जग रचना रचें मूढ़ मती मत होय
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नारी संगत है भली लें ममता की छाँव
नाना रूप धरे जगत हरि के दाबत पाँव
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पुत्री जबहि गृह जनमती श्री वृद्धी हो तात
रिश्ता निभाय वो कई सबसे सुन्दर मात
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पुत्री जनम है शुभ सदा संशय करो न भाय
दीक्षित कर भेजो उसे पीहर सुखी बनाय
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२५-०७-२०१४
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
August 2, 2014

पुत्री जनम है शुभ सदा संशय करो न भाय दीक्षित कर भेजो उसे पीहर सुखी बनाय सुन्दर संदेशपरक दोहे! आदरणीय कुशवाहा जी, आपकी कलम जब चलती है ध्राप्रवाह चलती है सादर प्रणाम आपको भी और लखनऊ को भी

alkargupta1 के द्वारा
August 1, 2014

संदेशप्रद दोहे आदरणीय कुशवाह जी

sadguruji के द्वारा
August 1, 2014

नारी संगत है भली लें ममता की छाँव नाना रूप धरे जगत हरि के दाबत पाँव ! आदरणीय कुशवाहा जी ! सादर अभिनन्दन ! बहुत सार्थक और शिक्षाप्रद दोहे ! इस रचना के लिए बधाई !


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