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कल और आज

Posted On: 20 May, 2014 Others में

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कल और आज
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ईंट-गारे से चुनी
ऊँची-ऊँची दीवारें
आँगन में खुलते द्वार
तुलसी चौरा केन्द्र बिंदु

कुट्टी काटती चाची
रंभाती गाय
कोने में जलता चूल्हा
रोटी की सोंधी सुगंध
टूटी खाट पर दादी से लिपटे बच्चे
किस्से-कहानी सुनते हुए
नृत्य करता जीवन
फलती-फूलती भारतीय संस्कृति
कंगूरे पर बैठे कपोत
आज भी गवाह हैं

दरकती दीवारें
उनसे लटकती घास
रिश्तों को नया आयाम देता
क्षत-विक्षत तुलसी चौरा
बरसों से बंद द्वार
मौत के सन्नाटे को चीरती
जीवन का एहसास कराती
झींगुरों की ध्वनि

विनष्ट होती संस्कृति
रिश्तों की मिठास
काली रात में ढूँढते जुगनू
आज भी गवाह हैं

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak pande के द्वारा
May 26, 2014

बहुत खूब सुन्दर और सरल परन्तु गहरी भावनाओं SE ओट प्रोत

jlsingh के द्वारा
May 21, 2014

श्रद्धेय कुशवाहा जी, सादर अभिवादन! बस याद ही गवाह है …संस्कृति विनष्ट हो चुकी है … अब इस नए माहौल में तंदूर रोटी की खुशबू और तंदूर काण्ड ही गवाह हैं तुलसी पौधे की जगह ‘मनी प्लांट’ ने ले ली है … फिर भी यादें शेष है तुलसी चौरा और रंभाती गाय टूटी खत पर दादी या दादा से बच्चे न भी लिपटें तो भी अहसास जरूरी है …नहीं तो…..


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