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भारतीय किसान

Posted On: 28 Mar, 2014 Others में

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भारतीय किसान

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जय जवान जय किसान

जग का नारा झूंठा

भाग्य किसान  कैसा तेरा

प्रभू भी तुझसे रूठा

लेकर हल खेत में

नंगे पाँव तू जाए

मखमली कालीन पे

वणिक विश्राम पाए

भरता सगरे जग का पेट

खुद है  भूखा सोता

बिके फसल  तेरी जब

कर्जा कम न होता

हाय रे किस्मत तेरी

कैसा  भाग्य अनूठा

जय जवान जय किसान

जग का नारा झूंठा

देता अपना खून पसीना

इक  दाना तब बनता

बाजार जाये जब फसल

भाव  न पूरा  मिलता

उधार ले  खाद और पानी

बीज जमाए  न जमता

कृषि  रक्षा उपकरणों में

काला  धंधा है चलता

व्यापारी और सरकार ने

आपस में है रिश्ता गूंठा

जय जवान जय किसान

जग का नारा झूंठा

मौलिक

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

२३.०३.२०१४

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
April 3, 2014

आज के यथार्थ को दर्शाती सुन्दर प्रस्तुति के लिए HAARDIK बधाई ! सादर !1

jlsingh के द्वारा
March 30, 2014

कृषि रक्षा उपकरणों में काला धंधा है चलता व्यापारी और सरकार ने आपस में है रिश्ता गूंठा जय जवान जय किसान जग का नारा झूंठा योजनाएं बनती धरती सूखी रहती, किस्मत भी रूठा जय जवान जय किसान जग का नारा झूंठा

OM DIKSHIT के द्वारा
March 29, 2014

आदरणीय कुशवाहा जी,नमस्कार. बहुत दिनों बाद आप की रचना पढ़ने का अवसर मिला.एक दम सही कहा आप ने ,किसान परेशान,वणिक धनवान,हो सकता है,आने वाले समय में यही नारा लगे.

yamunapathak के द्वारा
March 28, 2014

आदरणीय प्रदीप सर ये सही चित्रण है इस बार भी खेती जुआ ही साबित हो गई. साभार

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 28, 2014

आदरणीय श्री कुशवाहा जी, बहुत ही उम्दा बहुत ही सच और किसानों के दर्द को बयां करती आपकी एक बहुत ही संजीदा रचना.. =आकाश तिवारी=


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