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मैं एक पेड़ हूँ // कुशवाहा //

Posted On: 12 Jan, 2014 Others में

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तनहा खड़ा

एक पेड़ हूँ मैं

बरसों पहले

नन्हा सा प्यारा बच्चा

पास के जंगल से

मोहित हो मेरे रूप पर

अपनी नन्ही बाँहों में भर

घर मुझे ले आया था

कोमल हाथों से अपने

आंगन में मुझे बसाया था

सोते जागते उठते बैठते

पास मेरे मंडराता था

सुबह शाम पानी देकर

मन ही मन इठलाता था

बच्चे खेलें साथ मिलकर

उनसे मुझे बचाता था

आँगन उसका इतना बड़ा था

जैसे होता माँ का दिल

रह न जाऊं कहीं  अकेला

नित नए पेड़ लगाता था

साथ -साथ हम बड़े हुए

कई साथी मुझको दिए

अपना घर परिवार बढाया

जीवन के हर सुख-दुःख में

अपना साझीदार बनाया

कल चक्र से सब बंधे हुए

समय बीता हम जुदा हुए

वो आज नहीं है

पर अभी हूँ मैं

अकेले में खड़ा

एक पेड़ हूँ मैं

प्रदीप  कुमार सिंह कुशवाहा

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vaidya surenderpal के द्वारा
January 15, 2014

अकेले में खड़ा एक पेड़ हुँ मैं बहुत सुन्दर काव्य रचना प्रदीप जी।

afzalkhan के द्वारा
January 13, 2014

मेरे ब्लॉंगर दोस्तो आप को जान कर खुशी हो गी के मे जल्द ही अपना हिन्दी न्यूज़ वेब पोर्टल http://www.khabarkikhabar.com शुरु कर रहा हु. आप से निवेदन है के आप अपना लेख हमे अपने bio-data और photo के साथ भेजे.आप अपना phone number भी भेजे. आप से सहयोग की प्रार्थना है. kasautitv@gmail.com khabarkikhabarnews@gmail.कॉम 00971-55-9909671 अफ़ज़ल ख़ान

January 12, 2014

और मैं उस पेड़ का एक पत्ता……………..

jlsingh के द्वारा
January 12, 2014

पेड़ की जड़े मजबूत हैं, वे मिट्टी के अंदर घुसकर दूर तक नवजीवन का संचार कर रही है. पेड़ कभी तनहा नहीं होता वह हमेशा दूसरों को छाया और फल देता है …चिड़ियाँ उस पर बसेरा करती हैं… सादर श्रद्धेय!

OM DIKSHIT के द्वारा
January 12, 2014

आदरणीय कुशवाहा जी, नव-वर्ष की बधाई.विचारणीय भाव-युक्त पंक्तियों ने मन मोह लिया….’वो आज नहीं हैं..पर अभी हूँ मैं…..एक पेड़ हूँ मैं.’


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