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क्यों न नेता बन जाऊँ (हास्य-कविता)

Posted On: 10 Dec, 2013 कविता में

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जुम्मन अब्बू से बोला
दो पैसा बदलूँ चोला
निठल्लू जवान खाते गोला
सुधरो जल्दी तुमको बोला
पैसा न एक मेरे पास
कमाओ खुद छोडो आस
धंदा कोई न आता रास
बाजार करता न विश्वास
जेब कटी की सारी कमाई
पुलिस ले उडी भाई
युक्ती सुन्दर तुम्हे बताता
बन जा नेता का जमाता
अच्छी है ये तुम्हरी सीख
मांगनी पड़े अब न भीख
छुट भैया में बड़ा लोचा
करूँ धंधा कई बार सोचा
पनवाडी ने करा खाता बंद
सब बोले धंदा है मंद
माल मुफ्त अब मत खाओ
जीना है अगर यूँ ही
पुलिस मैन बन जाओ
पुलिस वालों की क्या जिंदगी
भ्रष्ट नेतन की करें बंदगी
नेता बन किस्मत अजमाऊँ
मंत्री पुत्र को साला बनाऊँ
पेट्रोल पम्प हों कई मधुशाला
गुजरे समय बीच रंगशाला
द्वार बैठ स्वामिभक्त कहलाऊँ
भोले बन राज जान जाऊँ
निकले वैकेंसी जब सदन में
गिरगिट अस दिखूँ हर दल में
साधू चोला ले चमकूँ गगन में
महामहिम बन दिखूँ  सदन में

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
December 21, 2013

है अगर यूँ ही पुलिस मैन बन जाओ पुलिस वालों की क्या जिंदगी भ्रष्ट नेतन की करें बंदगी नेता बन किस्मत अजमाऊँ मंत्री पुत्र को साला बनाऊँ पेट्रोल पम्प हों कई मधुशाला गुजरे समय बीच रंगशाला द्वार बैठ स्वामिभक्त कहलाऊँ भोले बन राज जान जाऊँ निकले वैकेंसी जब सदन में गिरगिट अस दिखूँ हर दल में साधू चोला ले चमकूँ गगन में महामहिम बन दिखूँ सदन में अब तो अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी को भी नेता होना , और बनना सिखा दिया है , लग जाइये लाइन में ! नम्बार आ ही जाएगा ! बहुत सटीक शब्द आदरणीय श्री प्रदीप कुशवाहा जी

jlsingh के द्वारा
December 15, 2013

अब आम आदमी भी नेता बन सकता है, महोदय! समस्त शुभकामनाओं के साथ!

आर.एन. शाही के द्वारा
December 14, 2013

अब यही एक कसर बाक़ी रह गई है मालिक, इसे भी पूरी कर ही लीजिये, ताक़ि वहाँ से टोपी पहनने कहीं वापस न आना पड़ जाए । आज एक राज़ की बात बताते हैं सिर्फ़ आपको ! वह यह कि आप मानें या न मानें यह हमारा पुनर्जन्म है । जब पहुँचे तो हमसे पूछा गया कि ‘वो’ किया या नहीं किया ? हम अवाक़ कि भला यह ‘वो’ कौन सा कर्म है भाई ! तब धर्मराज के इशारे पर चित्रगुप्त जी ने मुझे स्वर्ग के उस अन्त:पुर का दृष्य दिखाया, जो एकमात्र रहस्यमय कारण है स्वर्गारोहण की इच्छाओं का । अब मैं क्या कहता ? इन्कार में सिर हिलाते ही धर्मराज जी ने जो सींग लगाई तो स्वयं को पुन: मृत्युलोक की उसी खटिया पर औंधे मुँह पड़ा पाया था । तभी से लगातार कर्मरत हूँ । अगर आप इस अवस्था में भी नेता न बने, तो कहीं आपके साथ भी पुन: मूषको भव: का अभिशाप न चिपक जाय । सावधान मित्र !

    jlsingh के द्वारा
    December 15, 2013

    राज की बात!… अंत:पुर!… हे राम …घोर कलियुग… बुजुर्गों की बेदर्दी!… जय राम जी की!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    December 15, 2013

    जी साब, इस राज़ को खोलता नहीं परन्तु मित्रवर की कुलाँचें देखकर मुखर होना पड़ा कि सावधान कर ही दूँ । क्या पता नेतागिरी के चक्कर में कहीं वास्तविक ड्यूटी से विमुख न हो जायँ । ही ही …

Ravinder kumar के द्वारा
December 13, 2013

प्रदीप जी, सादर नमस्कार. व्यंग्य और कटाक्ष के साथ बेहतरीन हास्य कविता. शुभकामनाएं.

sadguruji के द्वारा
December 13, 2013

बहुत अच्छी हास्य कविता,बधाई.

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
December 13, 2013

प्रदीप जी नमस्कार / आज भारतवर्ष में नेता बनने जैसा आसान और कठिन काम दूसरा कुछ नहीं हैं / कुछ लोग घर, परिवार , धन – सम्पदा सब कुछ लुटाकर नेता नहीं बन पा रहे और कुछ लोगों को बैठे -बिठाये गद्दी मिल जा रही है /

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 12, 2013

श्रद्धेय प्रदीप जी , सादर ! बहुत दिनों बाद मुलाक़ात हो रही है | अच्छी तस्बीर खींची है छुटभैये की ! बधाई !!

omdikshit के द्वारा
December 10, 2013

आदरणीय कुशवाहा जी, नमस्कार. बहुत सुन्दर.नेता और गिरगिट ..वाह !सटीक!!

sinsera के द्वारा
December 10, 2013

वाह दादा …प्रणाम …क्या दूर की कौड़ी है..


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