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PRADEEP KUSHWAHA


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अच्छे दिन -थूक दिया भाई थूक दिया-सबने हम पर थूक दिया।

Posted On: 14 Jan, 2016  
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अधखुला शटर

Posted On: 14 Jan, 2016  
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लेखक हूँ ?

Posted On: 14 Jan, 2016  
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नौटंकी – राष्ट्रीय चरित्र

Posted On: 14 Jan, 2016  
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मुनादी (नौटंकी) –सहिष्णुता

Posted On: 14 Jan, 2016  
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आरक्षण –महिला

Posted On: 14 Jan, 2016  
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” अपना वतन ”

Posted On: 14 Jan, 2016  
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” सुनहरे दिन -२ ”

Posted On: 13 Jan, 2016  
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” सुनहरे दिन ”

Posted On: 13 Jan, 2016  
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आखेट -पुरस्कार

Posted On: 12 Jan, 2016  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

अब यही एक कसर बाक़ी रह गई है मालिक, इसे भी पूरी कर ही लीजिये, ताक़ि वहाँ से टोपी पहनने कहीं वापस न आना पड़ जाए । आज एक राज़ की बात बताते हैं सिर्फ़ आपको ! वह यह कि आप मानें या न मानें यह हमारा पुनर्जन्म है । जब पहुँचे तो हमसे पूछा गया कि 'वो' किया या नहीं किया ? हम अवाक़ कि भला यह 'वो' कौन सा कर्म है भाई ! तब धर्मराज के इशारे पर चित्रगुप्त जी ने मुझे स्वर्ग के उस अन्त:पुर का दृष्य दिखाया, जो एकमात्र रहस्यमय कारण है स्वर्गारोहण की इच्छाओं का । अब मैं क्या कहता ? इन्कार में सिर हिलाते ही धर्मराज जी ने जो सींग लगाई तो स्वयं को पुन: मृत्युलोक की उसी खटिया पर औंधे मुँह पड़ा पाया था । तभी से लगातार कर्मरत हूँ । अगर आप इस अवस्था में भी नेता न बने, तो कहीं आपके साथ भी पुन: मूषको भव: का अभिशाप न चिपक जाय । सावधान मित्र !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: Bhagwan Babu Bhagwan Babu

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

यह प्रश्न स्वभाविक है, जिज्ञासा भी है कि कैसे मदद की जाय। कौन सा प्लेटफार्म चुना जाय, क्या उन लोगों से सम्पर्क किया जाय जो समाज में विभिन्न प्रकार से सेवा दे रहे हैं। निश्चित तौर पर ऐसा करने में कोई बुराई नही है जब ऐसे साधु पुरुषों के सानिध्य में जायेंगे तो हिचक भी खुलेगी व मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा, परन्तु जिस प्रकार हर कार्य के करने में सावधानी की जरुरत होती है यहाँ भी सतर्क रहना है और ऑंखें खुली रखनी है। अन्ध भक्ति और अन्ध विश्वास सदैव घातक होता है। क्यों कि यह विश्वास रखना चाहिए कि कभी जो दिखता है वो होता नही है और जो नहीं दिखता है वह होता है। ईश्वर ने हमें अन्यों की तुलना में एक अस्त्र दिया है वो विवेक है। यह अस्त्र सदैव खुला रखना चाहिए।मेरी दृष्टि में इस दुर्गुण से बचने का उपाय है कि सेवा के लिये मन में वचन देना होगा। दृढ़ विश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ जब हम मैदान में उतरेंगे तो कभी भी सन्मार्ग से भटकेंगे नही। यह सत्य है कि प्रकृति का नियम है लेना और देना, जो बोयेंगे वही काटेंगे। क्या हम यह नही कर सकते कि केवल दें और ले न ? ऐसा करके देखने में हर्ज ही क्या है। कर के देखिये। अपार सुख, अपार आनन्द, अपार शान्ति की प्राप्ति हो तो इसे भी समाज में बांटिये । हम असल में इतने अपने आप में कुत्सित हो गए हैं की सच कहूँ तो इंसान आज इंसान है ही नहीं ! प्राचीन काल में दान के द्वारा समाज के संतुलन को साधा जाता था किन्तु आज सब अपने लिए ही जीना जानते हैं. विद्वानों का कथन है कि किसी जरूतमंद की सहायता हम अपनी क्षमता के अनुसार शारीरिक, मानसिक या अध्यात्मिक तौर पर कर सकते हैं. बहुत सुन्दर लेखन आदरणीय प्रदीप जी

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदर्णीय प्रदीप कुमार जी , बहुत ही सुन्दर और सार्थक लेख , मन प्रसन्न हो गया ।  बहुत बहुत आभार । आप ने सही कहा कि सेवा मन वचन और कर्म से होती है । इस के  अतिरिक्त सेवा तन मन और धन से भी होती है । इसमे यह क्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है ।  हमको सबसे पहले सशरीर सेवा के लिय़े प्रस्तुत होना होगा । हमको प्रतिदिन , अथवा  प्रति सप्ताह , अथवा प्रति माह कुछ घंटे समाज सेवा के लिये निकालने होंगे और उनको  मन से अर्थात इमानदारी से समाज सेवा में निवेश करने होंगे । यकीन मानिय़े  फिर  धन की समस्या कभी आडे नहीं आये गी । परन्तु दुर्भाग्य से आज यह क्रम उलट  गया है । आज हम समाज सेवा के नाम पर मात्र कुछ धन दे कर अपने कर्तव्य की इति श्री मान लेते हैं । सोचिये क्या यह उचित है ? सोचिये जब अपने घर मे कोई अपना स्वजन अस्वस्थ होता है तो हम अपने दस काम छोड  उसके पास बैठते हैं , उसकी सेवा करते हैं । परन्तु आज जब समाज अस्वस्थ है , तब हम  केवल उसकी आलोचना करें , चर्चा करे परन्तु उसके लिये कोई समय ना दे पायें , यह तो  न्यायपूर्ण नहीं है ।

के द्वारा: anilkumar anilkumar

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

श्रद्धेय महोदय, सादर अभिवादन! शतक जब लगाते हैं, गीत नया गाते हैं, जनता जनार्दन को भूल कैसे जाते है! जनता जनार्दन देख रही नीचे से नेता जी मंच पर, वार करे पीछे से मौका जो मिल गया नेता सब मिल गया संसद से सड़क पर कर रहे वार हैं. जनता बेचारी है, भूख से ही यारी है नागनाथ, साप नाथ कमल को मरोड़े हाथ कैसी लाचारी है! नेता न सीखेंगे दांत दर्द चीखेंगे पप्पू से फेंकू नपे अब अगली तैयारी है .. इसके बाद आप दिखें मन में संताप रखे ......... इस बार वोट दो पांच वर्ष न आउंगा दूर से तकोगे हाथ नही आउंगा बैठ सदन में ठंडी हवा खाऊंगा भूलूँगा मैं तुम्हें तुम्हें याद आऊंगा मदारी बन मैं नाच खूब नचाउंगा नख से शीर्ष तक पोशाक देखते रहे गीत वो गा रहे प्रचार देखते रहे पुष्प झरें मुखार से तलवार देखते रहे जे जे शतक पर ढेरों सुभकामना!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

श्रद्धेय महोदय, सादर प्रणाम! पहली बार जब मैं अपने गाँव के स्कूल में, अपने बाबूजी द्वारा लाया गया, हाथ में स्लेट और पेंसिल भी पकडाया गया. स्कूल के बड़े भैया लोगों द्वारा, मेरा खूब मजाक उड़ाया गया, मैं बुद्धू सा लगा रोने, माँ की गोद को याद कर लगा खोने! फिर मास्टर जी ने मुझे, अपने पास बुलाया,पुचकारा एक लेमन चूस पकड़ाया, मैं तो और ही घबड़ाया अब मास्टर जी ने मुझे लगाई हल्की सी चपत! लगता था मुझे इसी की थी जरूरत मैं मास्टर जी के डर से भागा, जैसे गहरी नींद से जागा घर के बाहर ही हो गयी मेरी, बाबूजी से मुलाकात माँ भी पूछने लगी क्या हुई बात ? बाबूजी फिर मुझे स्कूल तक ले आये, मास्टर जी को समझाया, इसे कायदे से पढ़ायें अब मास्टर जी को आया गुस्सा और छोटी सी रूल को दिखा कर बोले अब अगर तू रोयेगा, ये रूल तुझे धोएगा बाबूजी भी डर गए, न जाने किस मुसीबत में पड़ गए घर आकर अम्मा से कहने लगे अपनी गलती को समझने लगे. यह मास्टर गुरु है, या है कोई जल्लाद मेरे ही बेटे को, मेरे ही सामने रूल दिखलाता है यह भी नहीं समझता वह तन्खवाह क्या इसीलिये पाता है? मेरा वश चलता तो कभी भी अपने बेटे को स्कूल न ले जाता अरे क्या कमी है मेरे घर में ... वो दो कौड़ी का मास्टर मेरे बेटे को धमकाता है मेरा बेटा तो मेरा लाडला है मेरे खून से इसका नाता है. स्कूल से अच्छा तो मंदिर है जहाँ पुजारी जी घंटी बजा आरती करते हैं, सबको भजन सुना प्रसाद वितरित करते हैं! एक बार पुन: प्रणाम! विद्यालय को हम कैसे मंदिर माने? जहाँ प्रसाद की जगह छड़ी मिलती है हम तो पहले पहले इसी बात को जाने!.......

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय कुशवाहा जी, सादर अभिवादन ! बड़े ही अनुकूल समय में आपकी यह रचना आयी है! आज ही देखिये आचार्यकुलम का उद्घाटन हुआ जहाँ बच्चों को संस्कार के साथ आधुनिक शिक्षा दी जायेगी. यहाँ पुराण के साथ आधुनिक विज्ञान के भे पढ़ाई होगी. अगर बाबा रामदेव और नरेन्द्र मोदी का सपना पूरा होता है तो आनेवाले दिनों में जरूर परिवर्तन होंगे! नैतिक शिक्षा की महत्ता बढ़ गयी है ! जरूरी हुई नैतिक शिक्षा मन आवेगों को रोको सूरज तपना छोड़े न मयूर न छोड़ता नर्तन सैनिक बजाता बांसुरी कवि करता अब कीर्तन बदलेगा समाज कैसे कैसे शांति अब आएगी रामायण गीता भूले सब सोचो कैसे क्रांति आयेगी सादर! दो बाकी है, शतक लगाने में अप्रैल में हो जाना चाहिए!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

के द्वारा: bhagwanbabu bhagwanbabu

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

के द्वारा: bhanuprakashsharma bhanuprakashsharma

के द्वारा: AJAY KUMAR CHAUDHARY AJAY KUMAR CHAUDHARY

अब यही होगा । कम्बल बरसेगा, पानी भींगेगा । घास दूध देगी, गाय खाकर । ट्रेन स्टेशन पहूँचकर राम के ऊपर चढ़कर बैठ जाएगी । कलियाँ भँवरे के ऊपर घूम-घूम कर, झूम-झूम कर गाएंगी । आसमान बरसने के बाद पानी साफ़ हो जाएगा । नैया बीच नदिया डूबेगी, उतराएगी । बाप जवान होकर बेटे के बुढ़ापे का सहारा बनेगा । क्योंकि, 'ना बीवी ना बच्चा, ना बाप बड़ा ना मइया, द होल थिंग इज दैट कि भइया, सबसे बड़ा रुपइया !' कन्हइया आ रहे थे सर जी, लेकिन नुक्कड़ पर खड़ी गोपी ने उनका रास्ता बदल दिया । बड़े मार्मिक स्वर में गाए जा रही थी - 'ओ कन्हइया, कन्हइया, कन्हइया ! जा के पनघट पे देखो, तेरी राधा अकेली खड़ी… तेरी राधा अकेली खड़ी !!' कान्हा को लौटना ही था, आखिर उनकी भी तो कुछ प्राथमिकताएँ हैं भाई साहब, हमें तो कहीं भी आकर देख लेंगे, दोज़ख से जहन्नुम तक ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: AJAY KUMAR CHAUDHARY AJAY KUMAR CHAUDHARY

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के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

सादर चरण स्पर्श नाना जी! जल उठी हवस आग बिखर गए सारे राग अश्रु नयन सूख गए बुझ गए जले दिए बता कहाँ करे गुहार बलात्कार बलात्कार बलात्कार .............पत्थर दिल को भी द्रवित कर दिया आपने............विचारों का सशक्त और सार्थक प्रस्तुतीकरण................ पत्थर दिल को भी द्रवित कर दिया आपने फ़ोलिमैन के आलेख :आखिर तुम चाहते क्या हो?: के बाद मैं भी एक टूटी फूटी रचना लिखा हूँ.........वो जल्दी-जल्दी में ........क्योंकि और भी काम है मुझे इन वाह्यात कामों के अलावा. तबतक आप मेरी रचना और फ़ोलिमैन के आलेख का लुत्फ़ उठायें..........मुझे जोर की नींद आ रही है.......... दरिंदों को ख़त्म करने की मांग करने वालों, जो दरिंदगी है हमारे बीच, सोचो उसका क्या है? यहाँ एक मौका चाहिए तुम्हारे तमाशे के लिए, जो होकर गुजरता है इससे उसकी खता क्या है? अब तक आराम से अपने घरों में बैठने वालों, अभी एक तुम्हारी भी बहन है और एक मेरी भी, मेरे इस सवाल पर आखें फाड़कर देखता क्या है? आखिर तुम चाहते क्या हो???????????/////// जो इज्जत से गया अबरू से गया, सडकों पर अब तमाशा बनाता क्या है, गैरत बाकि थी अगर तुझमे अब तक, घटना घटित होने से पहिले करता क्या है?.............अनिल कुमार .अलीन. http://follyofawiseman.jagranjunction.com/2012/12/24/%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%8b/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

श्रद्धेय महोदय, सादर अभिवादन! विलम्ब के लिए क्षमाप्रार्थी. बिलकुल समयानुकूल रचना प्रस्तुत की है आपने! अंतिम सन्देश या संकल्प हम सबको लेना ही चाहिए! "नारी शोषण करते जो उनपर करो प्रबल प्रहार शपथ हमें, तभी मनाएंगे सारे तीज और त्यौहार! आज दिल्ली पुलिस का एक और क्रूरतम चेहरा दिखा, एक महिला का कहना था - "आज दिल्ली पुलिस ने हम सभी महिलाओं का रेप कर दिया" संदीप दीक्षित (शीला दीक्षित के सपूत) पुलिस कमिश्नर का तबादला चाहते हैं! ...ये हो क्या रहा है! कोई राजनीतिक पार्टी के नेता सामने नहीं आ रहा है..... बाबा राम देव और अरविन्द केजरीवाल ही आखिर में इन सबका मनोबल बढ़ाएंगे? बहुत अंधेर हो रहा है! २१.१२.१२ का ही एक असर तो है की आधी आबादी पर जुल्म हो रहा है और सभी खामोश हैं!

के द्वारा: jlsingh jlsingh